Wednesday, March 25, 2015

प्रिय कूटस्थ,
स्नेह.
पहले एक सुचना.
कुछ मित्रोंको यह यात्रा अत्यंत प्रिय अनुभव हो रही है. यहां रोज एक अध्याय होगा.
कल एक स्पष्टता करना विस्मृत कर गया. कल जिस स्थान पर मैं शब्दका प्रयोग किया उस मैं को अवतरण चिन्हमें रखना था. क्योंकि यह वो मैं नहीं जिसे संस्कृत में अहम्, अंग्रेजीमें आइ, हिन्दीमें मैं, गुजरातीमें हुं कहते है. यह वो मैं है जो मैं होकर भी सर्वस्व,सर्वत्र है. प्रत्येक मनुष्यमें है, प्रत्येक मनुष्यका मैं है, यद्यपि किसी एक का नहीं है. यह वो मैं है जो हर एक मैं के चारों तरफ है. मैं जो भी सोचता है,करता है उसे यह मैं देखता रहेता है. जिस क्षण मेरा मै, उस व्यापक मैं को देख लेगा उस दिन मैं मिट जाएगा. मैं को उपलब्ध होना ही मैं का त्याग है. मैं में लिप्त होना संसार है, अज्ञान है. मैं में लुप्त हो जाना ज्ञान है, साक्षात्कार है, मोक्ष है.
कल हमने स्थूल कूटस्थ...लोहेके कूटस्थको देखा. हमारे भीतर जो अंतःकरण है वो भी कूटस्थ है. उस पर अनेक प्रकारके विचार-वृति-भिन्न भिन्न भावानओंके प्रहार होते है किंतु कूटस्थका आकार नहीं बदलता.
कूटस्थका यह उदाहरण पूरी आध्यात्मिकताका सारांश है. यदि इस उदाहरणको ठीकसे समझ कर उसका चिंतन एवम् मनन किया जाए तो किसी भी शास्त्र अथवा ग्रंथ, कथा-उपदेशकी आवश्यकता नहीं.
कल हमने दर्पण,बिंब एवम् प्रतिबिंबकी बात करी थी.
जिज्ञासु मित्रोंके लिए एक प्रयोग देता हूं. प्रयोगके बारेमें कोइ विवरण, कोइ सुचना,कोइ स्पष्टताकी आवश्यकता नहीं. आप स्वयं अनुभव करें.
मध्यम कद के दो दर्पण ले और उस दर्पणके बीचमें कोइ वस्तु रखें और दोनों दर्पणमें बारी बारी देखें...क्यां दिखता है....अनगनित प्रतिबिंब दिखेंगे. थोडे दिन रोज यह प्रयोग करें. आपके मनमें कुछ समजमें आने लगेगा. वो समज पुरी तरह स्पष्ट हो जाएं तो उसे मन ही मनमें घूटते रहिए...पुनरावर्न करते रहें. समज अधिक स्पष्ट एवम् स्वच्छ होने लगेगी.
जब यह हो जाए तो दो दर्पनके मध्य किसी वस्तुके स्थान पर अपना चहेरा रखे....और देखते रहें...देखते रहें....देखते रहें.....एक क्षण आएगी....जो एक सेकन्डके 100वें हिस्से जितनी छोटी होगी. आपको अनुभव होगा कि दो दर्पनके बीच आपके चहेरेके जो अनगिनित प्रतिबिंब दिख रहे थे वो कहीं गुम हो गए...और रह गया कोरा दर्पन...जिसमें कोइ प्रतिबिंब नहीं था. बस उस क्षणको अपने अंदर स्थिर होने दे.....
आपने साक्षात्कार कर लिया....मोक्षको उपलब्ध हो गए.....अब उस क्षणके 100वें हिस्से जितना जो मोक्ष मिला था....जो साक्षात्कार हुआ था...उसका समय बढाना है....और ऐसी स्थितिको लाना है जो प्रतिक्षण रहे.
इसे कहते है सच्चे अर्थमें दर्पमें स्वका मुख देखना. दर्पणमें स्वका दर्शन. हम रोज दर्पनमें देखकर बाल बनाते है वो दर्पन देखना नहीं है.
आज इतना ही

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